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Sankatmochan Ashtak · तुलसीदास · आठ पद
संकटमोचन हनुमान जी की अष्टपदी स्तुति — सरल, गहरी, घर-घर प्रिय।
बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो॥
बाल्यकाल में सूर्य निगलने से तीनों लोक अंधेरे हुए — वह संकट किसी से न टला।
देवनान आनि करी बिनती तब छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥
देवों की विनती पर सूर्य छोड़ संकट निवारा — जग जानता है कपि संकटमोचन नाम।
बालि की त्रास कपीस बसै गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो। चोरहिं मारि सुग्रीवहिं राज दीन्हो मिलि राम रजायसु धारो॥
बालि के त्रास से कपीश्वर पर्वत पर — प्रभु-पथ देख, सुग्रीव को राज्य दिलाया।
अंगद के संग लै रघुनाथ प्रभु खोजत दसन जटायु हँकारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥
अंगद संग सीता खोज, जटायु का आह्वान — संकटमोचन नाम जग प्रसिद्ध।
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
हनुमान गोसाईं की जय — गुरुवत कृपा करें।